जीआईएमएस संकाय के मार्गदर्शन में अनुष्का अग्रवाल का शोध अंतरराष्ट्रीय समकक्ष-समीक्षित जर्नल Sleep Science and Practice में प्रकाशित; 180 मेडिकल छात्रों पर किया गया अध्ययन
ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (GIMS), ग्रेटर नोएडा की एमबीबीएस छात्रा अनुष्का अग्रवाल ने चिकित्सा छात्रों में स्मार्टफोन की लत, सोने के समय को टालने की आदत और नींद की गुणवत्ता के बीच संबंधों पर अध्ययन किया है। जीआईएमएस के बहुविषयक संकाय दल के मार्गदर्शन में किए गए इस शोध को अंतरराष्ट्रीय समकक्ष-समीक्षित जर्नल Sleep Science and Practice में ओपन-एक्सेस शोध लेख के रूप में प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन का शीर्षक ‘चिकित्सा छात्रों में स्मार्टफोन की लत, सोने के समय को टालना और नींद की गुणवत्ता: एक प्रेक्षणात्मक अध्ययन’ है। Sleep Science and Practice BMC, Springer Nature द्वारा प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय समकक्ष-समीक्षित जर्नल है। शोध में चिकित्सा छात्रों की डिजिटल आदतों और नींद से जुड़े विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया।
180 मेडिकल छात्रों को अध्ययन में किया गया शामिल
यह क्रॉस-सेक्शनल प्रेक्षणात्मक अध्ययन 18 से 25 वर्ष की आयु के 180 चिकित्सा छात्रों पर किया गया। अध्ययन में स्मार्टफोन की लत, सोने के समय को टालने की आदत और नींद की गुणवत्ता का आकलन मान्य प्रश्नावलियों के माध्यम से किया गया। अध्ययन का प्रमुख निष्कर्ष यह रहा कि 180 में से 130 छात्रों यानी 72.2 प्रतिशत प्रतिभागियों में नींद की गुणवत्ता खराब पाई गई। निर्धारित लिंग-विशिष्ट मानकों के आधार पर 56.5 प्रतिशत पुरुष और 40.3 प्रतिशत महिला छात्रों में स्मार्टफोन की लत दर्ज की गई।
शोध में स्मार्टफोन की लत और खराब नींद की गुणवत्ता के बीच मजबूत सकारात्मक संबंध पाया गया। वहीं, सोने के समय को टालने की आदत का भी स्मार्टफोन की लत और खराब नींद, दोनों के साथ मध्यम स्तर का संबंध सामने आया।
स्मार्टफोन की लत और देर से सोना बने खराब नींद के संकेतक
आगे किए गए विश्लेषण में स्मार्टफोन की लत और सोने में देरी करने की आदत को खराब नींद के स्वतंत्र संकेतक पाया गया, जबकि आयु और लिंग महत्वपूर्ण संकेतक नहीं पाए गए। अध्ययन में यह भी सामने आया कि दिन के समय कार्यक्षमता में कमी और नींद की कम अवधि ने खराब समग्र नींद स्कोर में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शोधकर्ताओं के अनुसार, इन निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि मेडिकल छात्रों में नींद की समस्या को केवल कुल स्क्रीन टाइम के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
शोध में स्मार्टफोन से अलग न हो पाने और बार-बार सोने का समय टालने को एक-दूसरे से जुड़े व्यवहारिक पैटर्न के रूप में देखा गया है। इन व्यवहारों का संबंध कम नींद, दिन के समय थकान और एकाग्रता में कमी से पाया गया।
मेडिकल छात्रों के लिए नींद की गुणवत्ता महत्वपूर्ण
शोधकर्ताओं ने चिकित्सा छात्रों के संदर्भ में पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद के महत्व पर भी जोर दिया। चिकित्सा शिक्षा में विद्यार्थियों को लंबे समय तक अध्ययन, क्लिनिकल प्रशिक्षण और मानसिक एकाग्रता की आवश्यकता होती है। ऐसे में पर्याप्त नींद सीखने, स्मृति, भावनात्मक स्वास्थ्य और सतर्कता जैसे पहलुओं से जुड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर शोधकर्ताओं ने चिकित्सा संस्थानों में स्वस्थ डिजिटल आदतों और नींद की स्वच्छता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके लिए नियमित नींद की दिनचर्या को प्रोत्साहित करना, सोने से पहले स्मार्टफोन के उपयोग को कम करने के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा देर से सोने की आदतों पर ध्यान देना उपयोगी कदम हो सकते हैं।

जरूरत पड़ने पर छात्रों के लिए परामर्श और सहायता उपलब्ध कराने को भी एक संभावित संस्थागत उपाय के रूप में रेखांकित किया गया है। ऐसे प्रयास विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के साथ-साथ उनकी शैक्षणिक और व्यावसायिक कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं।
जीआईएमएस संकाय के मार्गदर्शन में हुआ शोध
इस शोध में अनुष्का अग्रवाल ने डेटा संग्रह, साहित्य समीक्षा और पांडुलिपि लेखन में योगदान दिया। अध्ययन का मार्गदर्शन डॉ. रूपाली कलसी और डॉ. मोहित कुमार माथुर ने किया, जबकि डॉ. अभिषेक भारती और डॉ. अतुल कुमार गुप्ता ने शोध में सहयोग प्रदान किया। जीआईएमएस के लिए यह अध्ययन इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि संस्थान के स्नातक चिकित्सा छात्र शोध गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं और उनके कार्य अंतरराष्ट्रीय अकादमिक प्रकाशनों तक पहुंच रहे हैं।
अध्ययन की सीमाओं को भी किया गया स्पष्ट
शोधकर्ताओं ने अध्ययन की सीमाओं को भी स्पष्ट किया है। चूंकि यह क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन था, इसलिए इसमें विभिन्न कारकों के बीच महत्वपूर्ण संबंधों की पहचान की जा सकती है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि स्मार्टफोन का उपयोग सीधे तौर पर खराब नींद का कारण बनता है।
इसके बावजूद, अध्ययन में खराब नींद की उच्च दर तथा स्मार्टफोन की लत, सोने के समय को टालने और नींद की गुणवत्ता के बीच पाए गए संबंध मेडिकल छात्रों की डिजिटल आदतों और नींद से जुड़े व्यवहार पर समय रहते ध्यान देने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशन मिलने से जीआईएमएस के विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों के बीच शोध एवं अकादमिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।

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