ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे।
एक ओर जहां ग्रेटर नोएडा को स्मार्ट सिटी और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर बारिश के आते ही असलियत की स्याही से विकास का यह सपना धुंधला पड़ जाता है। शहर के अंडरपासों की हालत इतनी बदतर हो चुकी है कि वे जनता के लिए सुविधा की बजाय एक दैनिक आपदा बन गए हैं।

मानसून की पहली ही बारिश में UPSIDA और L&T द्वारा बनाए गए अंडरपासों में पानी भर गया, जिससे ना सिर्फ स्कूल, कॉलेज, ऑफिस और व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुईं, बल्कि पूरा ट्रैफिक नेटवर्क चरमरा गया।


अंडरपास नहीं, बारिश का तालाब! – प्रशासन की नाकामी उजागर

130 मीटर रोड, न्यू दादरी जंक्शन, शिवालिक होम्स, E होम्स, तिलपता चौक, Migsun Wynn, पैरामाउंट गोल्फ फॉरेस्ट, और ग्रेटर नोएडा वेस्ट से जोड़ने वाले सभी प्रमुख अंडरपास जलभराव के कारण ठप हो गए। इन इलाकों में रहने वाले हज़ारों लोग मानो शहर से कट गए हों।

एक निवासी ने बताया –

“बारिश आते ही पानी घुटनों तक भर जाता है। ना बस निकल सकती है, ना बाइक। पैदल चलना तो भूल ही जाइए। हमने अंडरपास मांगा था, जलकुंड नहीं।”


सुबह से शाम तक — हर वर्ग के लोग हो रहे हैं प्रभावित

  • स्कूल बसें घंटों फंसी रहीं या रद्द कर दी गईं
  • कॉलेज स्टूडेंट्स लेक्चर मिस कर रहे हैं
  • ऑफिस जाने वाले कर्मचारी डेली लेट हो रहे हैं
  • दुकानदारों और व्यापारियों का नुकसान करोड़ों में पहुँच रहा है
  • आपातकालीन सेवाएं जैसे एंबुलेंस को वैकल्पिक मार्ग से जाना पड़ रहा है, जिससे कई बार जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाता है

किसकी है ये लापरवाही? जनता पूछ रही है जवाब

  • जनता का कहना है कि ये सड़कों और अंडरपासों की हालत किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से नहीं, बल्कि सरकारी एजेंसियों की घोर लापरवाही का परिणाम है।
  • L&T, UPSIDA और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने करोड़ों रुपये की लागत से अंडरपास बनाए, लेकिन ड्रेनेज सिस्टम की कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई।

सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा, #WaterloggedNoida ट्रेंड पर

लोगों ने ट्विटर (X), फेसबुक और इंस्टाग्राम पर विडियोज़ और तस्वीरें साझा करते हुए लिखा:

“स्मार्ट सिटी या स्मार्ट स्विमिंग पूल? अंडरपास देखकर अब डर लगता है।”


नागरिकों की पांच मुख्य मांगें

  1. तुरंत जल निकासी और पंपिंग सिस्टम की व्यवस्था की जाए।
  2. L&T और UPSIDA के जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।
  3. हर मानसून से पहले सभी अंडरपासों की सफाई और निरीक्षण अनिवार्य किया जाए।
  4. डिजास्टर मैनेजमेंट टीम की तैनाती की जाए ताकि ट्रैफिक ना रुके।
  5. स्थायी समाधान हेतु इंफ्रास्ट्रक्चर रिव्यू और रीडिजाइन हो।

क्या होंगे कानूनी और राजनीतिक नतीजे?

स्थानीय नागरिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द कार्यवाही नहीं हुई तो वे जनहित याचिका (PIL) दाखिल करेंगे और RTI के जरिए सभी प्रोजेक्ट्स का खर्चा व गुणवत्ता रिपोर्ट सार्वजनिक करवाएंगे।

आरडब्ल्यूए ने यह भी बताया कि वे जन प्रतिनिधियों और सांसदों से मिलकर केंद्रीय स्तर पर शिकायत दर्ज कराएंगे।


प्रशासन की चुप्पी से बढ़ रहा असंतोष

प्रशासन की ओर से अब तक सिर्फ “जल्द समाधान की कोशिश की जा रही है” जैसा बयान आया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में कोई सुधार नहीं दिख रहा। इससे आम जनता में सिस्टम पर विश्वास लगातार घटता जा रहा है।


? जनता की आवाज़ — “हमें जवाब चाहिए, बहाने नहीं!”

ग्रेटर नोएडा वेस्ट, तिलपता, पैरामाउंट और Migsun जैसे इलाकों में रहने वाले लोगों की एक ही पुकार है:

“अगर सुविधा देने का दावा करते हो तो सुविधा भी दो।
हमने टैक्स पानी में बहाने के लिए नहीं दिया था।”


अब क्या होगा?

  • अगर प्रशासन ने 15 दिनों के भीतर कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला, तो सड़क पर प्रदर्शन और डिजिटल विरोध की बड़ी योजना तैयार हो चुकी है।
  • सिविल डिफेंस और RWA प्रतिनिधियों की एक मीटिंग भी प्रस्तावित है, जिसमें मानसून प्रबंधन पर प्रस्ताव पारित होगा।

नतीजा?

बारिश थम जाएगी, लेकिन जनता की नाराजगी अब सैलाब बनकर बहने को तैयार है। और इस बार यह सैलाब सिर्फ पानी का नहीं होगा, बल्कि जवाबदेही की मांग का होगा।


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