नोएडारफ़्तार टूडे। एक ऐतिहासिक आध्यात्मिक क्षण के 100 वर्ष पूर्ण होने परयोगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़इण्डिया (YSS) के नोएडा आश्रम में भक्ति‍मय कीर्तन और ध्यान की एक अत्यंत प्रेरणादायक संध्या आयोजितहुईजिसमें हज़ारों से अधिक प्रतिभागियों ने शांति और आंतरिक उत्थान के शक्तिशाली सामूहिक अनुभव में भागलिया।

यह कार्यक्रम 18 अप्रैल, 1926 की ऐतिहासिक संध्या को स्मरण कराता हैजब परमहंस योगानन्दजी ने न्यूयॉर्कके कार्नेगी हॉल में पश्चिमी जगत् के सामने भक्ति‍मय कीर्तन का परिचय कराया था। 2,800 सीटों वाला वह हॉलउमड़ पड़ा थाहज़ारों लोग " गॉड ब्यूटीफुल" (O God Beautiful) के कीर्तन में सम्मिलित हुए थेजिससेगहन आध्यात्मिक परिवर्तन का वातावरण निर्मित हुआ थाजो उनके मंच छोड़ने के बाद भी जारी रहा।

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुएस्वामी स्मरणानन्दजी ने (अंग्रेज़ी मेंऔर स्वामी अद्यानन्दजी (हिन्दी मेंने इसशताब्दी के गहरे महत्व पर अपने विचार प्रस्तुत किए। स्वामी स्मरणानन्दजी ने बल दिया कि “आत्म-शक्ति सेपरिपूर्ण संगीत ही वास्तविक विश्वव्यापी संगीत हैजो सभी हृदयों द्वारा समझा जा सकता है,” इस प्रकार भक्ति‍मयकीर्तन की सार्वभौमिकता को परमात्मा तक पहुँचने के प्रत्यक्ष मार्ग के रूप में रेखांकित किया।

उन्होंने आगे समझाया कि भक्ति‍मय कीर्तन केवल एक संगीतमय अभिव्यक्ति नहीं हैबल्कि एक वैज्ञानिकआध्यात्मिक अभ्यास है। योगानन्दजी की शिक्षाओं के अनुसारयह मन को एकाग्र करता हैभक्ति जाग्रत करता हैऔर चेतना को अंतर्मुखी बनाता है। उन्होंने कहा कि कीर्तन ध्यान में “आधी लड़ाई” को जीतने के समान हैक्योंकि यह साधक को शीघ्रता से गहन जागरूकता और आंतरिक शांति की अवस्था में ले जाता है।

योगानन्दजी की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुएउन्होंने बताया कि भक्ति‍मय कीर्तन,

चेतना का उत्थान करता है और भक्ति को जाग्रत करता है

लय और राग के माध्यम से एकाग्रता को सशक्त बनाता है

चिंताभय और बेचैनी को दूर करने में सहायक है,

गहरे ध्यान और आंतरिक निश्चलता का मार्ग प्रशस्त करता है। स्पंदनों की शक्ति के माध्यम से शारीरिकमानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर परिवर्तन ला सकता है

संध्या का मुख्य आकर्षण ब्रह्मचारी भास्करानन्द जी के नेतृत्व मेंसंन्यासियों के साथ एक तल्लीन कर देने वालाभक्ति‍मय कीर्तन सत्र था। पवित्र कीर्तन  " गॉड ब्यूटीफुल"  (God Beautiful) से आरंभ होकरयह सत्रअंग्रेज़ी और हिन्दी में कॉस्मिक चैंट्स की शृंखला के माध्यम से आगे बढ़ाजो संक्षिप्त ध्यानमय विरामों से परिपूर्णथा।

जैसे ही अनेकों स्वर एक साथ उठेवातावरण भक्ति की गहराई से ओतप्रोत हो गया। अनेक प्रतिभागियों नेआंतरिक निश्चलताभावनात्मक मुक्ति और आध्यात्मिक उत्थान का अनुभव कियाजो 1926 की मूल घटनाकी प्रतिध्वनि थीजब उपस्थित लोगों ने ईश्वर-साक्षात्कार तथा शरीरमन और आत्मा की चंगाई का अनुभवकिया था।

स्वामी स्मरणानन्दजी ने यह भी बताया कि भक्ति‍मय कीर्तन एक कला हैजिसमें निष्ठाभावना और आंतरिकतल्लीनता आवश्यक है। सच्चा कीर्तनउन्होंने कहाशब्दों और ध्वनि से परे जाकर साधक को परमात्मा से जोड़देता है।

कार्यक्रम का समापन स्वामी अद्यानन्द जी के संक्षिप्त संबोधन से हुआजिन्होंने उपस्थित लोगों को वाईएसएस(YSS) की शिक्षाओं के और अधिक अध्ययन के लिए प्रेरित कियाजिसमें राजयोग का मार्ग शामिल हैजोभक्तिध्यान और संतुलित जीवन का समन्वय करता है।

विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।

यह नोएडा सभा एक वैश्विक शताब्दी समारोह का हिस्सा थीजिसमें उसी दिन संयुक्त राज्य अमेरिका के कार्नेगीहॉल में एक समानांतर कार्यक्रम आयोजित किया गयाजो भक्ति की सार्वभौमिक भाषा के माध्यम से विश्वभर केहृदयों को जोड़ता है।

जैसे-जैसे संध्या समाप्त हुईएक संदेश सभी के भीतर गूंजता रहा:

जब संगीत भक्ति से परिपूर्ण हो जाता हैतो वह केवल ध्वनि नहीं रहतावह दिव्य अनुभव का माध्यम बन जाताहै।