सार
आबादी में बढ़ोतरी के मुताबिक नहीं बढ़ सकी परिवहन सुविधा। नाकाफी साबित हो रहे हैं तमाम साधन।दिल्ली में दिख जाते हैं देहात जैसे दृश्य... - फोटो : अमर उजाला
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आबादी और अंतिम छोर तक पहुंचने के लिए वाहनों की कम संख्या और अलग अलग क्षेत्रों की जरूरत के मुताबिक परिचालन से हालात में सुधार की उम्मीद विशेषज्ञ जताते हैं। इसे दुरस्त करने के लिए जरूरी है कि सभी क्षेत्रों की जरूरतों का पता करने के बाद रूट तय किए जाएं। नियमित अंतराल पर अगर कम खर्च में आखिरी छोर तक पहुंचने की सुविधा यात्रियों को मिले तो सार्वजनिक परिवहन को अपनाने की राह की मुश्किलें काफी कम हो सकती हैं।
जानकारों के मुताबिक इसके लिए जरूरी है कि क्षेत्र विशेष की सड़कें और वाहनों की जरूरतों के मुताबिक रूट तय कर, नियत समय पर इनका परिचालन किया जाए। वाहनों के जाम की स्थिति को ध्यान में रखते हुए रूट तय किए जाने चाहिए। इससे गंतव्य तक पहुंचने में न तो अधिक खर्च होगा और न ही किसी और परेशानी का सामना करना पड़ेगा। सुविधाओं में सुधार और सभी मार्गों तक पहुंच बढ़ने से घर से दफ्तर, स्कूल, कॉलेज या किसी भी जरूरी काम के लिए सफर में सहूलियतें बढ़ सकती हैं। ऐसा न होने से यात्रियों को कैब या ऑटो में सफर के लिए अधिक खर्च करना पड़ रहा है।
प्रतिस्पर्धा नहीं, जरूरी है पूरक बनने की
विशेषज्ञ अनन्या के मुताबिक लास्ट माइल कनेक्टिविटी के लिए प्रतिस्पर्धा के बजाय सभी परिवहन साधनों को एक दूसरे के पूरक के तौर पर प्रयोग में लाने की जरूरत है। लास्ट माइल कनेक्टिविटी को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए जरूरी है कि मेट्रो और बसों के नेटवर्क के साथ आखिरी छोर तक की कनेक्टिविटी हो। करोल बाग, लाजपत नगर, कमला नगर, इंडस्ट्रियल कनेक्शन की जरूरतें अलग अलग हैं। इनका अध्ययन कर जरूरत के मुताबिक लागू करने से सहूलियतें बढ़ सकती हैं। दफ्तरों तक आने जाने के लिए मिनी या फीडर बसों से सुविधाएं बढ़ सकती हैं। गलियों तक पहुंचने के लिए तयशुदा रूट पर शेयर पर चलने वाले ऑटो, ई रिक्शा की सुविधा जरूरी है। इससे अंदरूनी हिस्से तक बेहतर कनेक्टिविटी होगी। स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, मंडी, औद्योगिक क्षेत्र सहित तमाम जगहों का अध्ययन करने के बाद लास्ट माइल कनेक्टिविटी से दिल्ली वासियों को काफी राहत मिल सकती है।
एक लाख से अधिक ई रिक्शा
सरकार की ओर से ई रिक्शा को प्रोत्साहित करने का असर दिखने लगा है। अब तक एक लाख से अधिक ई रिक्शा पंजीकृत हो चुके हैं जबकि ऑटो की संख्या भी इससे अधिक है। ई ऑटो को भी सरकार की ओर से लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण के साथ साथ इससे लोगों को पर्यावरण के लिहाज से स्वच्छ ईंधन के वाहनों से सफर का मौका भी जल्द मिलने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि इससे कई सुदूर और दिल्ली के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचना पहले से सुगम हो जाएगा।
फीडर बसों से भी नहीं मिल रही हैं यात्रियों को राहत
दिल्ली मेट्रो ने भी यात्रियों की सुविधा के लिए फीडर बसों की शुरुआत की। लेकिन मुख्य मार्गों से गुजरने की वजह से अभी भी यात्रियों की परेशानियां कम नहीं हुई हैं। लॉकडाउन के दौरान बंद हुई मिनी और फीडर बसें सड़कों पर तो उतर आईं, मगर कमी का खामियाजा रोजाना यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है। दिल्ली मेट्रो ने कुछ महीने पहले ई बसों का परिचालन भी शुरू किया था, मगर इससे भी यात्रियों की सहूलियतें जरूरत के मुताबिक नहीं मिल रही हैं।
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