ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। विश्व हृदय दिवस से पहले शारदाकेयर हेल्थसिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियक साइंसेज की ओर से ग्रेटर नोएडा स्थित अस्पताल में नि:शुल्क कार्डियक एवं वैरिकोज वेन स्क्रीनिंग कैंप आयोजित किया गया। कैंप में ग्रेटर नोएडा और आसपास के क्षेत्रों से आए 100 से अधिक लोगों की जांच की गई। कार्यक्रम का उद्देश्य हृदय और वैस्कुलर संबंधी समस्याओं के शुरुआती संकेतों की पहचान, जोखिम कारकों के प्रति जागरूकता और समय पर चिकित्सकीय परामर्श को बढ़ावा देना रहा।

कैंप के दौरान विशेषज्ञ चिकित्सकों ने लोगों को नि:शुल्क परामर्श और ECG स्क्रीनिंग की सुविधा उपलब्ध कराई। वहीं, ECHO और कलर डॉप्लर जांच पर 50 प्रतिशत की छूट दी गई। सीने में तकलीफ, सांस फूलना, दिल की धड़कन तेज होना, हाई ब्लड प्रेशर, पैरों में सूजन या भारीपन, दर्द तथा नसों के उभरने जैसी शिकायतों वाले लोगों को विशेषज्ञों से परामर्श और आवश्यक शुरुआती जांच की सुविधा मिली।

चिकित्सकों के मुताबिक हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करने में शुरुआती पहचान और जोखिम कारकों का प्रबंधन महत्वपूर्ण है। हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी और तंबाकू का सेवन हृदय रोगों से जुड़े प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। ऐसे में नियमित स्वास्थ्य जांच और लक्षणों को नजरअंदाज न करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

शारदाकेयर हेल्थसिटी के कार्डियोलॉजी विभाग के HOD एवं सीनियर डायरेक्टर डॉ. अखिल के. रुस्तगी ने कहा कि सीने में तकलीफ, सांस फूलना या दिल की धड़कन तेज होना हमेशा तनाव अथवा जीवनशैली से जुड़ी समस्या नहीं होती। इसी तरह पैरों में लगातार सूजन, भारीपन या नसों का उभरना भी केवल कॉस्मेटिक समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे लक्षणों की विशेषज्ञ से जांच कराने से किसी संभावित कार्डियक या वैस्कुलर बीमारी की पहचान में मदद मिल सकती है।

जागरूकता और समय पर चिकित्सकीय परामर्श को बढ़ावा देना रहा

कार्डियोलॉजी विभाग के यूनिट हेड एवं डायरेक्टर डॉ. शुभेंदु मोहंती ने कहा कि कुछ हृदय संबंधी बीमारियों का पता शुरुआती चरण में स्पष्ट लक्षणों के बिना भी हो सकता है। क्लीनिकल जांच, इकोकार्डियोग्राफी और अन्य उपयुक्त जांचों के माध्यम से हृदय की कार्यप्रणाली का आकलन किया जा सकता है और आगे की जांच या उपचार की आवश्यकता निर्धारित की जा सकती है।

कैंप के दौरान हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट के बीच अंतर को लेकर भी लोगों को जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि हार्ट अटैक में हृदय की मांसपेशियों तक रक्त का प्रवाह बाधित होता है, जबकि कार्डियक अरेस्ट में हृदय की विद्युत गतिविधि में समस्या के कारण हृदय प्रभावी रूप से रक्त पंप करना बंद कर देता है। दोनों स्थितियां अलग हैं, हालांकि हार्ट अटैक कुछ मामलों में कार्डियक अरेस्ट का कारण बन सकता है।

इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी के प्रमुख एवं डायरेक्टर डॉ. विवेक टंडन ने कहा कि सीने में तकलीफ, सांस फूलना और दिल की धड़कन बढ़ना कुछ मामलों में कोरोनरी आर्टरी डिजीज के संकेत हो सकते हैं। लक्षणों और जांच के आधार पर चिकित्सक आगे की जांच अथवा उपचार की सलाह दे सकते हैं। उन्होंने हृदय संबंधी गंभीर समस्याओं से बचाव के लिए लक्षणों को समय पर पहचानकर चिकित्सकीय सलाह लेने पर जोर दिया।

कार्डियोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. गौतम अग्रवाल ने कहा कि पैरों में लगातार सूजन, भारीपन, दर्द या उभरी हुई नसों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। शुरुआती वैस्कुलर जांच से वैरिकोज वेन्स और अन्य संभावित समस्याओं की पहचान में मदद मिल सकती है। उपयुक्त मामलों में कम चीर-फाड़ वाली मिनिमली इनवेसिव प्रक्रियाओं के जरिए उपचार किया जा सकता है।

वहीं, नॉन-इनवेसिव कार्डियोलॉजी के हेड एवं सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अजीत सिंह ने नियमित प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे कोरोनरी आर्टरी डिजीज, वाल्व संबंधी समस्याओं, रिदम डिसऑर्डर और हार्ट फेलियर जैसी स्थितियों की शुरुआती पहचान में मदद मिल सकती है। उन्होंने हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल वाले लोगों को चिकित्सक से अपनी स्क्रीनिंग जरूरतों के संबंध में सलाह लेने की बात कही।

एसोसिएट कंसल्टेंट डॉ. प्रवीण रमन मिश्रा ने कहा कि कार्डियक स्क्रीनिंग हृदय संबंधी लक्षणों और जोखिम कारकों के आकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ECG, इकोकार्डियोग्राफी और अन्य डायग्नोस्टिक टेस्ट चिकित्सकों को आवश्यक क्लीनिकल जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं, जिसके आधार पर आगे की जांच की जरूरत तय की जाती है।

शारदाकेयर हेल्थसिटी के अनुसार यह कैंप उसके कम्युनिटी आउटरीच कार्यक्रम का हिस्सा था। इस पहल के जरिए लोगों को प्रिवेंटिव हेल्थकेयर, शुरुआती जांच और विशेषज्ञ चिकित्सकीय परामर्श के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया गया। कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि स्वास्थ्य संबंधी लक्षणों के गंभीर होने का इंतजार करने के बजाय समय रहते चिकित्सकीय सलाह लेना अधिक उपयोगी हो सकता है।