पिता बाबू तेजपाल भाटी की संगठनात्मक विरासत, बड़े भाई प्रवीण भाटी का राजनीतिक सफर और प्रणीत भाटी की लंबी न्यायिक लड़ाई; 15 दिसंबर 2021 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड में उनकी दोषसिद्धि रद्द कर किया था दोषमुक्त
ग्रेटर नोएडा/दादरी, रफ़्तार टूडे। दादरी की राजनीति का इतिहास केवल चुनावी मुकाबलों और नेताओं की जीत-हार तक सीमित नहीं है। यहां ऐसे राजनीतिक परिवार भी रहे हैं, जिनकी पहचान संगठनात्मक जिम्मेदारियों, सार्वजनिक जीवन में योगदान और कई उतार-चढ़ाव से बनी। प्रणीत भाटी का राजनीतिक सफर भी इसी पृष्ठभूमि से जुड़ा है। उनके पिता बाबू तेजपाल भाटी भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके थे, जबकि बड़े भाई प्रवीण भाटी ने भी पार्टी में जिला स्तर पर काम किया और दादरी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा।
प्रणीत भाटी ने भी संगठन में मंडल स्तर से लेकर जिला और प्रदेश स्तर तक विभिन्न जिम्मेदारियां संभालीं। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड से जुड़ा आपराधिक मुकदमा रहा। इस मामले में 2015 में विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी, लेकिन 15 दिसंबर 2021 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उनकी अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी तथा उन्हें संबंधित आरोपों से बरी कर दिया। अदालत के इस फैसले को समझना उनकी राजनीतिक यात्रा के न्यायिक पक्ष को जानने के लिए आवश्यक है।
पिता बाबू तेजपाल भाटी से जुड़ी संगठनात्मक विरासत
प्रणीत भाटी के पिता स्वर्गीय बाबू तेजपाल भाटी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के पुराने संगठनकर्ताओं में गिने जाते थे। उपलब्ध राजनीतिक जीवनवृत्त के अनुसार, वह उस दौर में गाजियाबाद भाजपा के जिलाध्यक्ष रहे, जब वर्तमान गौतमबुद्ध नगर जिले का बड़ा हिस्सा गाजियाबाद जिले के अंतर्गत आता था। उनके राजनीतिक परिचय में भाजपा की प्रदेश परिषद और राष्ट्रीय परिषद से जुड़ी जिम्मेदारियों का भी उल्लेख मिलता है। उस समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में भाजपा का संगठनात्मक विस्तार हो रहा था। ऐसे दौर में जिला स्तर पर पार्टी का नेतृत्व करना संगठन के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी।
बाबू तेजपाल भाटी का जुड़ाव शिक्षा क्षेत्र से भी बताया जाता है। उनके जीवनवृत्त में सरस्वती विद्या मंदिर, दादरी और नेहरू स्मारक हाईस्कूल, साकीपुर से संबंधित प्रबंधकीय भूमिकाओं का उल्लेख है। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि से यह स्पष्ट होता है कि भाजपा से जुड़ाव प्रणीत भाटी के सक्रिय राजनीतिक जीवन से पहले का है। हालांकि, परिवार की राजनीतिक विरासत और किसी व्यक्ति की अपनी संगठनात्मक उपलब्धियां अलग-अलग पहलू हैं, जिन्हें उनके कार्यकाल और जिम्मेदारियों के आधार पर समझना जरूरी है।
बड़े भाई प्रवीण भाटी: संगठनात्मक जिम्मेदारियों से विधानसभा चुनाव तक
इस परिवार की राजनीतिक कहानी में बड़े भाई स्वर्गीय प्रवीण भाटी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उपलब्ध राजनीतिक विवरण के अनुसार, उन्होंने भाजपा में जिला संगठन मंत्री, जिला महामंत्री और जिलाध्यक्ष जैसे पदों पर काम किया। बताया जाता है कि वह 1987 से 1989 तक जिला संगठन मंत्री, 1989 से 1990 तक जिला महामंत्री और 1990 से 1992 तक गाजियाबाद भाजपा के जिलाध्यक्ष रहे। वर्ष 1991 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी के रूप में दादरी सीट से चुनाव लड़ा।
उनका राजनीतिक सफर हालांकि अधिक लंबा नहीं चल सका। फरवरी 1992 में सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। परिवार के लिए यह एक बड़ी व्यक्तिगत क्षति थी। मूल राजनीतिक विवरण में दुर्घटना की परिस्थितियों को लेकर परिजनों के संदेह का भी उल्लेख है, लेकिन इसे प्रमाणित निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि आवश्यक है। प्रवीण भाटी का जीवन इस परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि का अहम हिस्सा है। संगठन में उनकी जिम्मेदारियां और दादरी से विधानसभा चुनाव लड़ना उस समय की क्षेत्रीय राजनीति में उनकी सक्रियता को दर्शाता है।
मंडल स्तर से भाजपा जिलाध्यक्ष तक प्रणीत भाटी का सफर
पिता और बड़े भाई की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बीच प्रणीत भाटी ने भी संगठनात्मक गतिविधियों में अपनी भूमिका बनानी शुरू की। उनके उपलब्ध राजनीतिक जीवनवृत्त के अनुसार, वर्ष 1992 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्राथमिक प्रशिक्षण वर्ग से जुड़ने के बाद उन्होंने दादरी क्षेत्र में संगठनात्मक गतिविधियों में भागीदारी बढ़ाई। वर्ष 1994 में उन्हें भाजपा के दादरी नगर मंडल में उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद उनका कार्यक्षेत्र जिला स्तर तक पहुंचा।
उपलब्ध विवरण के मुताबिक, 1 नवंबर 1997 को नवगठित गौतमबुद्ध नगर जिले में उन्हें भाजपा जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। वह वर्ष 2000 तक इस पद पर रहे। नए जिले में पार्टी संगठन को व्यवस्थित करना, स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करना और मंडल स्तर पर गतिविधियों को आगे बढ़ाना उस दौर की प्रमुख संगठनात्मक चुनौतियों में शामिल था। प्रणीत भाटी की राजनीतिक यात्रा का यह चरण उनके जिला स्तर पर नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित करता है। उनके कार्यकाल और पदों से जुड़े विवरणों का अंतिम सत्यापन पार्टी के अभिलेखों तथा संबंधित नियुक्ति दस्तावेजों से किया जाना चाहिए।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और किसान मोर्चा में जिम्मेदारियां
जिलाध्यक्ष के कार्यकाल के बाद भी प्रणीत भाटी का संगठनात्मक सफर जारी रहा। उनके राजनीतिक परिचय के अनुसार, वर्ष 2000 से 2008 के बीच वह भाजपा की पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्रीय समिति से जुड़े रहे और विभिन्न जिलों में संगठनात्मक तथा चुनाव संबंधी कार्यों में भागीदारी की। इस दौरान खुर्जा, बुलंदशहर, मुरादाबाद, अमरोहा और हापुड़ जैसे क्षेत्रों में काम करने का उल्लेख उनके जीवनवृत्त में मिलता है।
बाद के वर्षों में उन्हें भाजपा किसान मोर्चा में प्रदेश स्तर की जिम्मेदारियां मिलने की जानकारी भी दी गई है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, वह 2010 से 2012 तक प्रदेश उपाध्यक्ष और 2012 से 2015 तक प्रदेश महामंत्री रहे। इन पदों का उल्लेख उनके संगठनात्मक सफर को जिला स्तर से क्षेत्रीय और प्रदेश स्तर तक समझने में मदद करता है। हालांकि, पदों की अवधि और नियुक्तियों की आधिकारिक पुष्टि के लिए संबंधित संगठनात्मक रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे।
महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड: मुकदमे में कैसे आया प्रणीत भाटी का नाम?
प्रणीत भाटी के सार्वजनिक जीवन का सबसे चर्चित और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण अध्याय महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड से जुड़ा है। 13 सितंबर 1992 को दादरी के तत्कालीन विधायक महेंद्र सिंह भाटी और उनके साथ मौजूद उदय प्रकाश आर्य की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मामले की शुरुआती जांच के बाद इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई। जांच और मुकदमे के दौरान प्रणीत भाटी सहित कई लोगों के नाम सामने आए।
विशेष सीबीआई अदालत ने 28 फरवरी 2015 के फैसले में प्रणीत भाटी को दोषी ठहराया। 10 मार्च 2015 के सजा संबंधी आदेश में उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के साथ धारा 120-B के तहत हत्या और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित अपराध में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। अन्य संबंधित धाराओं के तहत भी सजा दी गई। प्रणीत भाटी ने निचली अदालत के फैसले को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी अपील आपराधिक अपील संख्या 152/2015 के रूप में दर्ज हुई।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: निचली अदालत का 2015 का फैसला उस समय की दोषसिद्धि थी, जबकि बाद में हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए उस फैसले को प्रणीत भाटी के संबंध में रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के बारे में क्या कहा?
उत्तराखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राघवेंद्र सिंह चौहान और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा शामिल थे। अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया। 15 दिसंबर 2021 के फैसले में अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य प्रणीत भाटी के खिलाफ दोषसिद्धि कायम रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे। फैसले में कथित आपराधिक षड्यंत्र से जुड़े साक्ष्यों, कुछ बयानों की स्वीकार्यता और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी पर विचार किया गया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का अपने निवास से फरार होना या वहां से चले जाना अपने आप में संबंधित अपराधों में दोषसिद्धि का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अभियोजन को आरोपों को कानूनी मानकों के अनुसार साक्ष्यों से साबित करना आवश्यक है। फैसले के अनुसार, प्रणीत भाटी के खिलाफ अभियोजन का एक प्रमुख आरोप यह था कि उन्होंने हमलावरों को महेंद्र सिंह भाटी की गतिविधियों या उनके स्थान की जानकारी दी थी। हाईकोर्ट ने इस आरोप को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाया। अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी को दोषसिद्धि बनाए रखने के लिए अपर्याप्त माना।
यह निष्कर्ष अदालत के फैसले पर आधारित है। इसे किसी अन्य आरोपी के मामले या पूरे हत्याकांड के सभी कानूनी पहलुओं पर स्वतः लागू नहीं माना जाना चाहिए।
15 दिसंबर 2021: दोषसिद्धि रद्द, प्रणीत भाटी बरी
15 दिसंबर 2021 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रणीत भाटी की आपराधिक अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने विशेष सीबीआई अदालत के 2015 के फैसले और सजा को उनके संबंध में रद्द कर दिया। उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 302/120-B, 307/120-B और 326/120-B के तहत लगाए गए आरोपों से दोषमुक्त कर दिया गया। फैसले में यह निर्देश भी दिया गया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
इस तरह, प्रणीत भाटी के मामले में हाईकोर्ट का फैसला उनकी कानूनी स्थिति के लिहाज से निर्णायक रहा। उनकी दोषसिद्धि समाप्त हुई और संबंधित आरोपों से उन्हें बरी कर दिया गया। इस न्यायिक घटनाक्रम का उल्लेख करते समय यह कहना सटीक होगा कि हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ निचली अदालत की दोषसिद्धि रद्द कर उन्हें बरी किया। इससे आगे कोई व्यापक निष्कर्ष निकालने के बजाय अदालत के वास्तविक आदेश और उसके आधारों को ही रिपोर्ट का केंद्र बनाना चाहिए।
न्यायिक संदर्भ: Praneet Bhati बनाम Central Bureau of Investigation, उत्तराखंड हाईकोर्ट, आपराधिक अपील संख्या 152/2015, निर्णय दिनांक 15 दिसंबर 2021। फैसले का विवरण अन्य कानूनी स्रोतों पर भी उपलब्ध है।
दादरी की राजनीति में परिवार, संगठन और न्यायिक इतिहास
प्रणीत भाटी की राजनीतिक यात्रा को तीन परस्पर जुड़े पहलुओं में समझा जा सकता है। पहला, उनके पिता बाबू तेजपाल भाटी और बड़े भाई प्रवीण भाटी की संगठनात्मक पृष्ठभूमि; दूसरा, स्वयं प्रणीत भाटी की मंडल, जिला और प्रदेश स्तर पर बताई गई जिम्मेदारियां; और तीसरा, महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड में चली लंबी न्यायिक प्रक्रिया तथा 2021 में हाईकोर्ट से मिली दोषमुक्ति। यह कहानी स्थानीय राजनीति के उस पहलू को सामने लाती है, जिसमें राजनीतिक विरासत, संगठन के भीतर वर्षों तक काम करने और न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने जैसे अलग-अलग अनुभव एक व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन को आकार देते हैं।
प्रणीत भाटी के राजनीतिक सफर से जुड़े पदों और पारिवारिक विवरणों की पुष्टि के लिए संगठनात्मक अभिलेख तथा समकालीन दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं। वहीं, उनके मुकदमे के संबंध में उत्तराखंड हाईकोर्ट का 15 दिसंबर 2021 का फैसला प्राथमिक न्यायिक दस्तावेज है।
रफ़्तार टूडे की इस विशेष रिपोर्ट में प्रणीत भाटी की राजनीतिक पृष्ठभूमि, परिवार की संगठनात्मक विरासत और न्यायिक संघर्ष को उपलब्ध विवरणों तथा अदालत के फैसले के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।

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