ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टुडे।
"एक पेड़ माँ के नाम" — यह नारा जब दिल से निकला था, तब इसमें संवेदना थी, सम्मान था और भविष्य के प्रति एक हरित संकल्प था। लेकिन अब यही पहल कुछ अफसरों और नेताओं की ‘फोटोबाजी’ की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। हरेंद्र भाटी जैसे जागरूक नागरिक जब खुलकर सामने आते हैं और पूछते हैं कि "कितने पेड़ लगाए और कितने बचे?", तो सवाल सिर्फ पर्यावरण का नहीं बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही का भी बन जाता है।


“कचनार मार्ग” — जो था एक हरित सपना, अब बन रहा है ‘मौन गवाही’

2021 में तत्कालीन ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के सीईओ नरेंद्र भूषण ने अमृतपुरम रोटरी से लेकर रामपुर जागीर गोल चक्कर तक की सड़क को "कचनार मार्ग" का नाम दिया था। उनके निर्देश पर यहां नेहा नर्सरी के मालिक विजेंद्र सिंह यादव की देखरेख में 180 कचनार के पेड़ लगाए गए थे। यह मार्ग एक मॉडल के रूप में विकसित किया जाना था — "शहर की सबसे खूबसूरत सड़क"।

लेकिन 2025 में जब इस मार्ग पर नजर डालते हैं, तो 180 में से एक या दो पेड़ ही जीवित बचे हैं। बाकी सब समय, उपेक्षा और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गए। अब इस स्थान पर कनेर और टिकोमा जैसे अन्य पौधे लगाए जा रहे हैं, जबकि मूल अवधारणा पूरी तरह गायब कर दी गई है।


“अबकी बार हिसाब होगा!” — हर पेड़ का लेखा-जोखा रखेंगे: हरेंद्र भाटी

सामाजिक कार्यकर्ता और एक्टिव सिटिजन हरेंद्र भाटी ने इस बार दो टूक शब्दों में कहा है:

"अबकी बार जितने पेड़ लगाए जाएंगे, उनका पूरा रिकार्ड हम नागरिक खुद रखेंगे। कौन पेड़ जीवित है, किसकी देखरेख हुई और कौन सिर्फ फोटो के लिए लगाया गया – सबका प्रमाण होगा।"

उनका कहना है कि “प्राधिकरण और नेताओं को सिर्फ कैमरे के सामने नहीं, पेड़ों की छांव में भी खड़ा होना पड़ेगा।”


“फोटोबाजी बंद की जाएगी, धरातल पर काम होना चाहिए”

हरेंद्र भाटी का यह कथन अब सोशल मीडिया पर भी वायरल हो चुका है:

"सांसद, विधायक, एमएलसी, जिला अध्यक्ष, या कोई भी जनप्रतिनिधि हो — यदि एक पेड़ लगाएं तो उसकी देखभाल भी करें। सिर्फ मीडिया कवरेज के लिए 50 पेड़ लगाकर जिम्मेदारी से भाग जाना पर्यावरण के साथ अन्याय है।"

उन्होंने आगे कहा: "एक पेड़ को उगाना, उसे बड़ा करना और फिर उसकी छांव में बैठना — ये जीवन का पुण्य कर्म है, मजाक नहीं।"


क्यों सूख जाते हैं सरकारी पौधे?

  1. देखरेख का अभाव: अधिकतर पेड़ लगाने के बाद उनकी सिंचाई, खाद, सुरक्षा आदि की कोई नियमित योजना नहीं बनती।
  2. ठेकेदारों की लापरवाही: नर्सरी या ठेकेदार से पेड़ तो लगवाए जाते हैं, पर रखरखाव की जिम्मेदारी पर निगरानी नहीं होती।
  3. प्राधिकरण की अनदेखी: पूर्व सीईओ नरेंद्र भूषण के आदेश के बावजूद अधिकारियों ने कोई फॉलोअप नहीं किया।
  4. सामाजिक भागीदारी की कमी: स्थानीय निवासियों और छात्रों को इस कार्य में जोड़ा नहीं गया।

शासन-प्रशासन को भी आईना

हरेंद्र भाटी ने राज्य सरकार और जिलाधिकारी कार्यालय को भी कटघरे में खड़ा करते हुए कहा:

"'एक पेड़ माँ के नाम' जैसे जन आंदोलनों को तब तक बल नहीं मिलेगा जब तक शासन-प्रशासन खुद जिम्मेदारी नहीं निभाएगा।"

उन्होंने बताया कि:

  • इस बार पेड़ लगाने के बाद उनकी जियो टैगिंग कराई जानी चाहिए।
  • हर पेड़ पर देखरेख अधिकारी का नाम लिखा जाना चाहिए।
  • एक निगरानी समिति बनाई जानी चाहिए जिसमें स्थानीय नागरिक भी शामिल हों।

हर कदम का लेखा-जोखा मांगा जाएगा

2025 के इस मानसून सीजन में जो भी वृक्षारोपण किया जाएगा:

✔ उसकी दिनांक, स्थान और किस्म दर्ज की जाएगी।
✔ 6 महीने और 1 साल बाद फोटो व GPS लोकेशन के साथ रिपोर्टिंग होगी।
✔ सूखे या मरे पेड़ों की जिम्मेदारी तय होगी।

इस पहल के पीछे हरेंद्र भाटी और उनके साथियों की टीम "एक्टिव सिटिज़न फ़ॉर ग्रीन नोएडा" काम कर रही है।


अब सवालों से डरने का नहीं, जवाब देने का वक्त

भाटी कहते हैं:

"मैं सांसद, विधायक, पूर्व जनप्रतिनिधियों से अपील करता हूं – अब समय आ गया है कि आप भी वृक्षारोपण में अपनी ईमानदारी दिखाएं। एक पेड़ लगाए, लेकिन उसकी सेवा भी करें।"

"एक देशप्रेमी का धर्म है कि वह वृक्ष लगाए और उसकी जड़ों को सींचे, न कि केवल रिबन काटे और फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करे।"


क्या हो अगला कदम?

? प्राधिकरण को चाहिए कि पूर्व सीईओ द्वारा घोषित "कचनार मार्ग" की पहचान को बहाल करे।
? नए पेड़ों की जियो टैगिंग और जनता को लाइव डेटा देना शुरू करे।
? रखरखाव ठेकेदार की जवाबदेही तय हो।
? आम नागरिकों को ‘ग्रीन वॉच’ ग्रुप में शामिल किया जाए।


निष्कर्ष: वृक्षारोपण सिर्फ उत्सव नहीं, जिम्मेदारी है

इस बार "एक पेड़ माँ के नाम" एक इवेंट नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी की मुहिम होनी चाहिए। प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और जनता – सभी को मिलकर हर पेड़ की जिम्मेदारी लेनी होगी।

यदि हम वास्तव में हरियाली और पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्ध हैं, तो हमें अपनी सोच और कार्यप्रणाली दोनों को बदलना होगा।


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