जेवर, रफ़्तार टूडे। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जेवर पर मंगलवार को हुई तेज बारिश के बाद टर्मिनल और पार्किंग क्षेत्र को जोड़ने वाले हिस्से में जलभराव का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने के बाद नए एयरपोर्ट की ड्रेनेज व्यवस्था, जल निकासी की क्षमता और मानसून के दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी पर सवाल खड़े हो गए हैं। वायरल वीडियो में एयरपोर्ट के कनेक्टिंग एरिया में बारिश का पानी जमा दिखाई दे रहा है, जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोग इसे लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कुछ यूजर्स ने मजाकिया अंदाज में इसे “एयरपोर्ट-कम-सीपोर्ट” तक कहना शुरू कर दिया।

हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार जलभराव स्थायी नहीं था। एयरपोर्ट प्रशासन की ओर से बताया गया कि भारी बारिश के दौरान टर्मिनल और पार्किंग के बीच के मार्ग पर पानी जमा हुआ था, जिसे लगभग 30 मिनट के भीतर साफ कर दिया गया। एयरपोर्ट अधिकारियों के मुताबिक इस दौरान फ्लाइट ऑपरेशन प्रभावित नहीं हुए और यात्रियों की आवाजाही को वैकल्पिक व्यवस्था के जरिए सुचारू रखा गया।

पहली बड़ी बारिश में जलभराव ने खड़े किए कई सवाल,

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को दिल्ली-NCR के लिए अत्याधुनिक और विश्वस्तरीय एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में विकसित किया गया है। ऐसे में इसके संचालन शुरू होने के कुछ ही समय बाद भारी बारिश के दौरान जलभराव की तस्वीरें सामने आने से स्वाभाविक रूप से सवाल उठ रहे हैं कि एयरपोर्ट परिसर में बारिश के पानी की निकासी के लिए तैयार किया गया सिस्टम कितनी क्षमता का है और क्या उसे स्थानीय स्तर पर हुई भारी बारिश के अनुरूप पर्याप्त रूप से डिजाइन किया गया है? यहां यह अंतर समझना भी जरूरी है कि किसी परिसर के किसी हिस्से में अस्थायी जलभराव होना अपने आप में निर्माण में खामी या भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। इसके लिए ड्रेनेज डिजाइन, उस समय हुई बारिश की तीव्रता, पानी के बहाव, पंपिंग व्यवस्था, सतही ढलान और जल निकासी की वास्तविक क्षमता की तकनीकी जांच जरूरी होगी।

यही कारण है कि फिलहाल “लापरवाही किसकी है?” इसका निश्चित जवाब देना जल्दबाजी होगी। इसके लिए एयरपोर्ट ऑपरेटर, निर्माण एजेंसी और संबंधित तकनीकी अधिकारियों की ओर से विस्तृत जांच अथवा स्पष्टीकरण सामने आना जरूरी है।

एयरपोर्ट प्रशासन ने क्या कहा?

जलभराव की घटना के बाद एयरपोर्ट प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित करने की जानकारी दी। रिपोर्टों के अनुसार पानी जमा होने के बाद एयरपोर्ट टीम ने तत्काल कार्रवाई करते हुए जल निकासी कराई और करीब आधे घंटे में स्थिति सामान्य कर दी गई। इस दौरान विमानों के संचालन पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। यात्रियों की आवाजाही को भी वैकल्पिक रास्ते के माध्यम से संचालित किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसका अर्थ यह है कि जलभराव का असर एयरपोर्ट के मुख्य फ्लाइट ऑपरेशन तक नहीं पहुंचा, लेकिन टर्मिनल और पार्किंग के बीच यात्री आवागमन वाले क्षेत्र में पानी जमा होना निश्चित रूप से एक ऐसा विषय है, जिसकी तकनीकी समीक्षा की जरूरत है।

₹12 हजार करोड़ नहीं, पहले चरण की लागत करीब ₹11,282 करोड़

सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर एयरपोर्ट की लागत करीब ₹12,000 करोड़ बताई जा रही है। व्यापक रूप से इसे ₹11,200 करोड़ के आसपास बताया गया है, जबकि कुछ हालिया रिपोर्टों में पहले चरण की लागत ₹11,282 करोड़ बताई गई है। इसलिए खबर में सटीकता के लिए इसे करीब ₹11,282 करोड़ का पहला चरण कहना अधिक उचित होगा। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का पहला चरण बड़े सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत विकसित किया गया है। एयरपोर्ट का विकास और संचालन यमुना इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड (YIAPL) द्वारा किया जा रहा है, जो ज्यूरिख एयरपोर्ट इंटरनेशनल से जुड़ी कंपनी है।

निर्माण की जिम्मेदारी टाटा प्रोजेक्ट्स के पास थी

एयरपोर्ट के पहले चरण के सिविल निर्माण का ठेका टाटा प्रोजेक्ट्स को दिया गया था। 2022 में कंपनी को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पहले चरण के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट मिला था। परियोजना में टर्मिनल, रनवे और अन्य प्रमुख एयरसाइड तथा एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण शामिल रहा। यही वजह है कि जलभराव का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर निर्माण गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। लेकिन केवल वायरल वीडियो के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि टाटा प्रोजेक्ट्स की लापरवाही से ही पानी भरा, तकनीकी रूप से उचित नहीं होगा। निर्माण पूरा होने के बाद एयरपोर्ट के संचालन, रखरखाव और जल निकासी व्यवस्था की जिम्मेदारियां भी अलग-अलग संस्थाओं और एजेंसियों से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए वास्तविक जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित अनुबंधों और संचालन व्यवस्था की जानकारी आवश्यक होगी।

राजनीतिक बयानबाजी भी हुई तेज

जलभराव का वीडियो वायरल होने के बाद मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। विपक्षी दलों और नेताओं की ओर से एयरपोर्ट की निर्माण गुणवत्ता और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए। आम आदमी पार्टी सहित विपक्षी आवाजों ने इसे बड़े निवेश वाले प्रोजेक्ट में कथित खराब निर्माण और भ्रष्टाचार से जोड़कर निशाना साधा। हालांकि, इन राजनीतिक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए इन्हें राजनीतिक आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि स्थापित तथ्य के रूप में।

क्या एयरपोर्ट की फ्लाइट सेवाओं पर पड़ा असर?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सामने आई जानकारी के अनुसार जलभराव के बावजूद फ्लाइट ऑपरेशन प्रभावित नहीं हुए। पानी जमा होने वाले हिस्से को तेजी से साफ किया गया और यात्रियों के आवागमन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की गई। यह एयरपोर्ट के ऑपरेशनल सिस्टम के लिहाज से सकारात्मक पहलू है, लेकिन दूसरी ओर यह घटना मानसून के दौरान एयरपोर्ट की resilience और drainage preparedness की परीक्षा भी मानी जा सकती है।

अब असली सवाल: क्या सिस्टम की तकनीकी जांच होगी?

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे बड़े और रणनीतिक प्रोजेक्ट में जल निकासी व्यवस्था केवल यात्रियों की सुविधा से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह एयरपोर्ट की ऑपरेशनल सेफ्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर रेजिलिएंस का भी हिस्सा है। अब सबसे अहम सवाल यह है कि एयरपोर्ट प्रशासन और संबंधित एजेंसियां इस घटना के बाद क्या कदम उठाती हैं। क्या जलभराव वाले क्षेत्र की तकनीकी जांच कराई जाएगी? क्या ड्रेनेज पाइपलाइन, पंपिंग सिस्टम, सतही ढलान और आउटफॉल की क्षमता की समीक्षा होगी? क्या अत्यधिक बारिश की स्थिति के लिए अतिरिक्त पंप या वैकल्पिक जल निकासी व्यवस्था तैयार की जाएगी?

इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण होंगे।

एयरपोर्ट की विश्वसनीयता के लिए छोटी घटना भी बड़ा सबक

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट अभी अपने शुरुआती परिचालन चरण में है और जून 2026 से यहां वाणिज्यिक उड़ानें शुरू हुई हैं। ऐसे समय में परिसर के किसी हिस्से में जलभराव की घटना भले ही कुछ समय में नियंत्रित कर ली गई हो, लेकिन यह भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर टेस्ट जरूर है। एयरपोर्ट को आने वाले वर्षों में बढ़ते यात्री दबाव और अलग-अलग मौसम की परिस्थितियों का सामना करना होगा। इसलिए मंगलवार की बारिश की घटना को केवल सोशल मीडिया के मजाक तक सीमित करने के बजाय इसे एक तकनीकी फीडबैक के रूप में देखना ज्यादा उपयोगी होगा। यदि जांच में ड्रेनेज क्षमता में कोई कमी मिलती है तो उसे समय रहते दूर किया जा सकता है।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना स्पष्ट है कि भारी बारिश के बाद टर्मिनल और पार्किंग के बीच जलभराव हुआ, पानी करीब 30 मिनट में निकाल दिया गया और फ्लाइट ऑपरेशन प्रभावित नहीं हुए। लेकिन जलभराव का वास्तविक कारण क्या था और क्या इसमें डिजाइन, निर्माण, रखरखाव या असाधारण बारिश में जल निकासी क्षमता से जुड़ी कोई कमी थी—इसका फैसला तकनीकी जांच और संबंधित एजेंसियों के आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद ही किया जा सकेगा।