चुनावी रिकॉर्ड में 1987 का ‘साहित्य रत्न’ और ‘Graduate’ श्रेणी दर्ज; पुराने न्यायिक एवं संस्थागत दस्तावेजों में शिक्षकीय पात्रता तथा कुछ विशिष्ट उद्देश्यों के लिए इसकी मान्यता के उल्लेख

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद सदस्य श्रीचंद शर्मा की शैक्षणिक योग्यता को लेकर चल रही बहस के बीच उनके सार्वजनिक चुनावी रिकॉर्ड और ‘साहित्य रत्न’ की ऐतिहासिक मान्यता से जुड़े पुराने न्यायिक दस्तावेज चर्चा में हैं। उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की ‘साहित्य रत्न’ परीक्षा को अलग-अलग समय और अलग-अलग उद्देश्यों के संदर्भ में शिक्षकीय पात्रता तथा कुछ संस्थागत व्यवस्थाओं में स्नातक स्तर से जोड़ा गया था। हालांकि इन न्यायिक रिकॉर्डों को श्रीचंद शर्मा की व्यक्तिगत शैक्षणिक योग्यता पर सीधे अंतिम कानूनी निष्कर्ष के रूप में पढ़ने के बजाय संबंधित समय के नियम, उद्देश्य और दस्तावेजों के संदर्भ में देखना जरूरी है।

चुनावी रिकॉर्ड में ‘Graduate’ और वर्ष 1987 का ‘Sahitya Ratan’

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के MyNeta पर उपलब्ध श्रीचंद शर्मा के archived election affidavit में उनकी Educational Details की श्रेणी ‘Graduate’ दर्ज है। इसी रिकॉर्ड में 1987 में Hindi Sahitya Sammelan, Prayagraj, U.P. से “Graduation in Sahitya Ratan” का उल्लेख किया गया है। यह विवरण उम्मीदवार द्वारा चुनाव के दौरान दाखिल किए गए स्व-घोषित हलफनामे के आधार पर उपलब्ध है।

यही रिकॉर्ड मौजूदा बहस का एक महत्वपूर्ण दस्तावेजी आधार है। हालांकि, चुनावी हलफनामे में किसी qualification को ‘Graduate’ श्रेणी में दर्ज किया जाना और किसी qualification की सामान्य अथवा कानूनी equivalence—दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं। इसलिए इस रिकॉर्ड को पुराने न्यायिक और संस्थागत दस्तावेजों के साथ पढ़ना अधिक उचित है।

1999 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में ‘Sahitya Ratna’ का शिक्षकीय पात्रता से संबंध

Purushottam Das Agarwal v. District Inspector of Schools, Allahabad मामले में 1999 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने हिंदी विषय में शिक्षक की qualification और promotion का प्रश्न आया था। फैसले में उस समय लागू qualification व्यवस्था का उल्लेख करते हुए हाईस्कूल स्तर पर हिंदी शिक्षक के लिए दो विकल्प दर्ज किए गए थे। इनमें एक विकल्प B.A. में हिंदी और संस्कृत के साथ आवश्यक शिक्षक-प्रशिक्षण qualification का था, जबकि दूसरे विकल्प में Hindi Sahitya Sammelan, Prayag का दो वर्षीय Sahitya Ratna course, जिसमें संस्कृत को ancient language के रूप में लिया गया हो, शामिल था।

अदालत ने उस मामले में यह माना कि संबंधित qualification व्यवस्था के संदर्भ में Sahitya Ratna को B.A. with Hindi and Sanskrit के साथ समतुल्य रूप में पढ़ा जा सकता है और इसी आधार पर याचिकाकर्ता की promotion eligibility पर विचार किया गया। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि ‘Sahitya Ratna’ का शिक्षकीय qualification से संबंध केवल हाल की सार्वजनिक बहस का विषय नहीं है, बल्कि दशकों पुराने सेवा-नियमों और उनकी न्यायिक व्याख्या में इसका उल्लेख मिलता है।

1973 के विश्वविद्यालयीय resolution का भी रिकॉर्ड

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के Babulal Sharma v. Vice-Chancellor मामले के 24 जुलाई 1975 के फैसले में एक महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयीय resolution का उल्लेख मिलता है। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, Awadesh Pratap Singh University, Rewa ने 1 दिसंबर 1973 के resolution के जरिए Hindi Sahitya Sammelan, Prayag की Sahityaratna examination को अपनी B.A. examination के equivalent मान्यता दी थी। लेकिन उसी रिकॉर्ड में यह भी स्पष्ट है कि यह मान्यता एक विशिष्ट उद्देश्य से जुड़ी थी—Sahitya Ratna उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को उसी विषय में विश्वविद्यालय के M.A. Previous में प्रवेश देने के संदर्भ में।

इसलिए इस फैसले से यह निष्कर्ष निकालना अधिक सटीक है कि एक विश्वविद्यालय ने निर्धारित उद्देश्य के लिए Sahitya Ratna को अपनी B.A. परीक्षा के equivalent स्वीकार किया था, न कि यह कि हर परिस्थिति में Sahitya Ratna स्वतः सार्वभौमिक रूप से B.A. degree के बराबर था।

1966 की सरकारी qualification व्यवस्था में भी ‘Sahitya Ratna’ का उल्लेख

दिल्ली हाईकोर्ट के Brat Pal Mandal v. Lt. Governor, Delhi मामले के 14 मार्च 1980 के फैसले में 12 अप्रैल 1966 की भारत सरकार की qualification व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।

अदालत ने दर्ज किया कि Government Higher Schools में Language Teachers Grade-II के लिए निर्धारित qualifications में B.A. अथवा संबंधित Oriental Degree के विकल्प के साथ Hindi Sahitya Sammelan, Prayag का Sahitya Ratna, कुछ अतिरिक्त शर्तों के साथ, शामिल था। साथ ही teaching degree/diploma अथवा निर्धारित teaching experience की शर्त भी दर्ज थी।  फैसले में यह भी दर्ज है कि Sahitya Ratna को 12 अप्रैल 1966 से संबंधित degree-level recognition के आधार पर उस समय के language-teacher pay-scale के संदर्भ में मान्यता मिली थी। यह रिकॉर्ड ‘Sahitya Ratna’ के ऐतिहासिक प्रशासनिक और शिक्षकीय उपयोग को समझने में महत्वपूर्ण है।

2008 का Chet Ram Gangwar मामला तस्वीर को और जटिल बनाता है

इस विषय पर सबसे महत्वपूर्ण सावधानी 2008 के Chet Ram Gangwar v. State of U.P. मामले से सामने आती है। इस मामले में याचिकाकर्ता ने दो वर्षीय Sahitya Ratna course किया था और हिंदी Lecturer के पद पर promotion के लिए B.A. with Sanskrit qualification से संबंधित विवाद उठा। 2007 में उनकी याचिका खारिज करते हुए Sahitya Ratna को B.A. with Sanskrit के equivalent न मानने का दृष्टिकोण अपनाया गया था। बाद में 2 जनवरी 2008 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1999 के Purushottam Das Agarwal फैसले का उल्लेख करते हुए review application स्वीकार की और संबंधित प्रश्न को बड़ी पीठ के विचार के लिए रखने का निर्देश दिया।

अर्थात, न्यायिक रिकॉर्ड में दोनों पहलू मौजूद हैं—एक ओर 1999 के फैसले में Sahitya Ratna को संबंधित शिक्षकीय qualification के संदर्भ में B.A. with Hindi and Sanskrit के बराबर माना गया, वहीं बाद के न्यायिक रिकॉर्ड में इस equivalence के प्रश्न को पुनर्विचार योग्य माना गया।

श्रीचंद शर्मा के मामले में क्या स्थापित होता है?

उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड से फिलहाल कुछ तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आते हैं।  पहला, श्रीचंद शर्मा के archived election affidavit में उनकी educational category Graduate दर्ज है और 1987 में Hindi Sahitya Sammelan, Prayagraj से Sahitya Ratan qualification का उल्लेख है।

दूसरा, पुराने न्यायिक रिकॉर्ड यह प्रमाणित करते हैं कि ‘Sahitya Ratna’ का इस्तेमाल अलग-अलग समय में शिक्षकीय qualification, pay-scale और कुछ विशिष्ट विश्वविद्यालयीय उद्देश्यों के संदर्भ में किया गया था। तीसरा, इन रिकॉर्डों में equivalence का दायरा हर मामले में समान नहीं था। कहीं इसे किसी विशेष शिक्षकीय qualification के विकल्प के रूप में देखा गया, कहीं किसी विश्वविद्यालय ने एक निश्चित उद्देश्य के लिए B.A. examination के equivalent माना और कहीं बाद में इसकी व्यापक equivalence पर न्यायिक प्रश्न उठे।

इसलिए श्रीचंद शर्मा की qualification पर चल रही बहस में इन दस्तावेजों का महत्व इस बात में है कि ‘Sahitya Ratna’ की शैक्षणिक और शिक्षकीय मान्यता का ऐतिहासिक संदर्भ मौजूद है, लेकिन किसी वर्तमान चुनावी अथवा कानूनी पात्रता का अंतिम निर्धारण संबंधित निर्वाचन नियम, लागू कानून और सक्षम प्राधिकारी के रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है।

आरोप-प्रत्यारोप से अलग दस्तावेजों को पढ़ना जरूरी

श्रीचंद शर्मा की शैक्षणिक योग्यता पर सार्वजनिक बहस के बीच उपलब्ध दस्तावेज एक बहुआयामी तस्वीर सामने रखते हैं। चुनावी हलफनामे में 1987 की Sahitya Ratan qualification के साथ Graduate category दर्ज है, जबकि पुराने न्यायिक और संस्थागत रिकॉर्ड बताते हैं कि Sahitya Ratna को अलग-अलग समय में शिक्षकीय qualification और विशिष्ट शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए मान्यता दी गई थी। इसलिए इस विषय पर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए केवल वर्तमान आरोपों या राजनीतिक बयानबाजी पर निर्भर रहने के बजाय मूल चुनावी हलफनामे, उस समय लागू qualification rules, संबंधित सरकारी आदेश और न्यायिक फैसलों को एक साथ देखना जरूरी है।

उपलब्ध रिकॉर्ड इतना अवश्य दिखाते हैं कि ‘Sahitya Ratna’ को लेकर भारत में एक पुराना न्यायिक एवं संस्थागत इतिहास मौजूद है और इसकी मान्यता का स्वरूप समय, पद और उद्देश्य के अनुसार अलग-अलग संदर्भों में निर्धारित हुआ है। श्रीचंद शर्मा के चुनावी रिकॉर्ड में दर्ज qualification को समझने के लिए इसी ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक है।