नोएडा, रफ़्तार टूडे। नोएडा प्राधिकरण की ई-साइकिल परियोजना एक बार फिर गंभीर आरोपों और सवालों के घेरे में है। परियोजना के माध्यम से अवैध विज्ञापन वसूली किए जाने का आरोप सामने आया है। आरोप है कि एक ब्लैक लिस्टेड कंपनी द्वारा नोएडा क्षेत्र के 62 डाकघरों के सामने अवैध यूनिपोल लगाकर विज्ञापन कराया जा रहा है, जिससे हर महीने करीब 15 करोड़ रुपये की अवैध वसूली की जा रही है। इस मामले में बाहरी विज्ञापन विभाग और संबंधित कंपनी के अधिकारियों की कथित मिलीभगत के आरोप भी लगाए गए हैं।
मामले ने इसलिए भी गंभीर रूप ले लिया है क्योंकि ई-साइकिल परियोजना के तहत डाकघरों के सामने लगाए गए विज्ञापन ढांचे और उनके संचालन को लेकर प्राधिकरण के स्तर पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि परियोजना की शर्तों और अनुबंध की स्थिति स्पष्ट होने के बावजूद विज्ञापन गतिविधियों को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए समय रहते कार्रवाई नहीं की गई।
2018 में शुरू हुई थी परियोजना
उपलब्ध जानकारी के अनुसार ई-साइकिल परियोजना पर वर्ष 2018 से काम शुरू हुआ था। वर्ष 2021 में करीब 1860 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में 62 डाक स्टेशनों का निर्माण किया गया। इस परियोजना से जुड़ा एक बड़ा सवाल करीब 50 करोड़ रुपये की जमीन कंपनी को निशुल्क दिए जाने को लेकर भी उठाया गया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि इतनी बड़ी कीमत की जमीन परियोजना से जुड़ी कंपनी को उपलब्ध कराई गई थी तो उसके बदले प्राधिकरण को मिलने वाले लाभ और अनुबंध की शर्तों का स्पष्ट पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए था। इसके बजाय अब विज्ञापन से बड़े स्तर पर राजस्व वसूली के आरोप सामने आने से पूरी परियोजना की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
अनुबंध समाप्त होने के बाद भी विज्ञापन जारी रहने का आरोप
मामले में प्राधिकरण अधिकारियों की ओर से यह दावा किया गया है कि जिस कंपनी को डाक स्टेशनों पर ई-साइकिल संचालन और विज्ञापन का अधिकार दिया गया था, उसका अनुबंध अगस्त 2025 में समाप्त कर दिया गया। यह स्थिति तब बनी जब प्राधिकरण के तत्कालीन सीईओ कृष्णा करुणेश ने पदभार संभालने के बाद जनस्वास्थ्य विभाग और नोएडा ट्रैफिक सेल (एनटीसी) को जनवरी में समाप्त कर दिया था। हालांकि, शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि अनुबंध समाप्त होने के बावजूद ई-साइकिल परियोजना के तहत अवैध विज्ञापन की वसूली रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। यदि किसी कंपनी का अनुबंध समाप्त हो चुका था तो उसके द्वारा विज्ञापन गतिविधियां जारी रखने की अनुमति कैसे मिली, यह पूरे मामले का महत्वपूर्ण सवाल बन गया है।
डाक स्टेशनों पर लगे यूनिपोल हटाने के निर्देश
मामले में नोएडा प्राधिकरण के महाप्रबंधक (सिविल) एसपी सिंह का बयान भी सामने आया है। उनके अनुसार डाक स्टेशनों को कब्जे में लेने और वहां अवैध रूप से संचालित यूनिपोल के विज्ञापन को बंद कराने का आदेश संबंधित अधिकारी को दिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ स्थानों को बंद कराने की सूचना से अवगत कराया गया है। यह कार्रवाई इस बात की ओर संकेत करती है कि प्राधिकरण के संज्ञान में मामला आने के बाद अब डाक स्टेशनों और वहां लगे विज्ञापन ढांचे की स्थिति की जांच तथा कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
शासन स्तर पर भी लगातार पहुंच रही शिकायतें
ई-साइकिल परियोजना से जुड़े कथित विज्ञापन घोटाले को लेकर शासन स्तर पर भी लगातार शिकायतें किए जाने की बात सामने आई है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि तत्कालीन अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी सतीश पाल के समक्ष भी कई बार इस मामले को रखा गया और शासन को इसकी आख्या प्रस्तुत की गई थी। इसके बावजूद शिकायतकर्ताओं का दावा है कि इस बार शासन स्तर पर अधिकारियों और संबंधित कंपनी की कथित सांठगांठ के आधार पर हर महीने करीब 15 करोड़ रुपये की विज्ञापन वसूली का आरोप लगाते हुए शिकायत की गई है। इन्हीं आरोपों के आधार पर मामले की जांच शुरू होने की बात कही जा रही है।
कंपनी को ब्लैक लिस्ट करने का मामला भी उठा
शिकायत में एक और गंभीर बिंदु यह है कि जिस कंपनी को ई-साइकिल परियोजना के तहत 62 डाक स्टेशनों पर विज्ञापन का अधिकार दिया गया था, उसके खिलाफ कार्रवाई और उसे ब्लैक लिस्ट करने का मुद्दा भी उठाया गया था। बताया गया है कि प्राधिकरण अधिकारियों ने कंपनी से 62 डाक स्टेशनों को वापस नहीं लिया, जबकि विज्ञापन का अधिकार जिस कंपनी को दिया गया था, उसके खिलाफ ब्लैक लिस्टिंग की कार्रवाई का उल्लेख सामने आया था। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इसके विपरीत कंपनी को करीब एक वर्ष तक संरक्षण दिए जाने का आरोप है।
यदि अनुबंध समाप्त हो चुका था और कंपनी के खिलाफ कार्रवाई प्रस्तावित थी, तो उसके बाद भी विज्ञापन अधिकार या विज्ञापन गतिविधियां कैसे जारी रहीं, यह जांच का प्रमुख विषय हो सकता है।
शासन स्तर पर जांच के आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन स्तर पर जांच के आदेश दिए जाने की बात भी सामने आई है। शिकायत में ई-साइकिल परियोजना का अनुबंध समाप्त करने और संबंधित कंपनी को ब्लैक लिस्ट करने का उल्लेख होने के बावजूद कथित रूप से विज्ञापन गतिविधियों के जारी रहने पर सवाल उठाया गया है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मामले में कार्रवाई के बजाय उसे दबाने का प्रयास किया गया। अब शासन स्तर पर जांच शुरू होने के बाद यह स्पष्ट होना बाकी है कि 62 डाक स्टेशनों पर विज्ञापन लगाने के अधिकार, अनुबंध की वास्तविक स्थिति, यूनिपोल की वैधता, विज्ञापन से होने वाली आय और प्राधिकरण को मिलने वाले राजस्व का पूरा हिसाब क्या है।
15 करोड़ रुपये मासिक वसूली के दावे की भी होगी पड़ताल जरूरी
पूरे मामले में सबसे बड़ा दावा हर महीने 15 करोड़ रुपये की अवैध विज्ञापन वसूली का है। इतनी बड़ी राशि की वसूली के आरोप को देखते हुए विज्ञापन दर, यूनिपोल की संख्या, विज्ञापन की अवधि, संबंधित कंपनी की आय और प्राधिकरण को जमा किए गए राजस्व का रिकॉर्ड जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। साथ ही यह भी जांचना जरूरी होगा कि 62 डाक स्टेशनों पर लगाए गए विज्ञापन यूनिपोल के लिए प्राधिकरण से वैध अनुमति ली गई थी या नहीं। यदि अनुमति नहीं थी तो संबंधित अधिकारियों ने समय रहते इन्हें हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं की और यदि अनुमति थी तो अनुबंध समाप्त होने के बाद विज्ञापन कैसे जारी रहे।
जांच से सामने आएगा पूरा सच
ई-साइकिल परियोजना का उद्देश्य शहर में वैकल्पिक और पर्यावरण अनुकूल परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देना था। ऐसे में यदि परियोजना की आड़ में अवैध विज्ञापन वसूली या नियमों के उल्लंघन के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करेगा। फिलहाल सामने आए आरोपों की शासन स्तर पर जांच और प्राधिकरण की कार्रवाई के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि 62 डाक स्टेशनों पर विज्ञापन संचालन किस नियम और अनुबंध के तहत हुआ, कंपनी को किस आधार पर अधिकार मिले, अनुबंध समाप्त होने के बाद विज्ञापन कैसे जारी रहे और कथित 15 करोड़ रुपये मासिक वसूली के दावे में कितनी सच्चाई है।
इस पूरे मामले में दस्तावेज, अनुबंध, विज्ञापन अनुमति, राजस्व रिकॉर्ड और यूनिपोल से संबंधित प्राधिकरण की फाइलें जांच का सबसे महत्वपूर्ण आधार बनेंगी। जांच पूरी होने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि मामले में वास्तविक अनियमितता हुई है या लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।

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