वर्ल्ड स्पाइन डे से पहले फोर्टिस ग्रेटर नोएडा में स्कॉलियॉसिस, गर्दन की खिसकी डिस्क और नसों पर दबाव के जटिल मामलों का इलाज; मिनिमली इनवेसिव और एंडोस्कोपिक तकनीकों से मरीजों को चलने-फिरने में मिली राहत

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। रीढ़ की हड्डी यानी स्पाइन से जुड़ी गंभीर समस्याएं व्यक्ति की चलने-फिरने की क्षमता, दैनिक गतिविधियों और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे मामलों में समय पर बीमारी की पहचान, विशेषज्ञों की सलाह और आधुनिक उपचार तकनीकें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वर्ल्ड स्पाइन डे से पहले फोर्टिस हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा में रीढ़ की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे चार मरीजों का सफल उपचार किया गया। इनमें 72 डिग्री तक मुड़ी रीढ़ की हड्डी, स्कॉलियॉसिस, गर्दन की डिस्क खिसकने और नसों पर दबाव के मामले शामिल थे। अस्पताल के अनुसार, उपचार के बाद मरीजों की स्थिति में सुधार हुआ और उन्होंने दोबारा चलना-फिरना शुरू किया।

इन मरीजों की देखभाल डॉ. हिमांशु त्यागी, निदेशक, ऑर्थोपेडिक्स विभाग के नेतृत्व में की गई। उपचार में डॉ. राजेश सुभाष मिश्रा और डॉ. कपिल खरे, सलाहकार, ऑर्थोपेडिक्स सहित अस्पताल की विशेषज्ञ टीम शामिल रही।

72 डिग्री तक मुड़ी रीढ़ की हड्डी का किया उपचार

पहले दो मामले कुशीनगर के 20 वर्षीय सिद्धार्थ सिंह और नोएडा की 16 वर्षीय राधिका चंदेला के थे। दोनों स्कॉलियॉसिस से पीड़ित थे। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें रीढ़ की हड्डी सामान्य सीध में रहने के बजाय एक तरफ मुड़ जाती है। पीछे से देखने पर रीढ़ का आकार अंग्रेजी के ‘C’ या ‘S’ अक्षर जैसा दिखाई दे सकता है। सिद्धार्थ की रीढ़ में गंभीर विकृति थी और उसका टेढ़ापन 72 डिग्री तक पहुंच गया था। वहीं, राधिका की रीढ़ के डॉर्सोलंबर हिस्से में विकृति थी, जिससे पीठ के मध्य और निचले हिस्से के जोड़ पर असर पड़ रहा था और उन्हें काफी दर्द का सामना करना पड़ रहा था।

अस्पताल के मुताबिक, दोनों मरीजों की विस्तृत जांच और विभिन्न विशेषज्ञों की अनुमति के बाद जनरल एनेस्थीसिया में स्कॉलियॉसिस सुधार सर्जरी की गई। इस प्रक्रिया में विशेष रॉड और स्क्रू की मदद से रीढ़ के अलाइनमेंट को बेहतर बनाने और उसे स्थिर रखने का प्रयास किया गया। सर्जरी के बाद दोनों मरीजों को आवश्यक देखभाल, रीढ़ को सहारा देने के लिए टेलर ब्रेस और विशेषज्ञों की निगरानी में रिकवरी संबंधी सहायता दी गई। अस्पताल के अनुसार, दोनों मरीजों ने सर्जरी के बाद चलना शुरू कर दिया और उनकी स्थिति में लगातार सुधार हुआ।

गर्दन की डिस्क खिसकने से हाथ में था तेज दर्द और सुन्नपन

तीसरा मामला दिल्ली के 44 वर्षीय जतिन त्यागी का था। उनकी गर्दन में रीढ़ की हड्डियों के बीच स्थित डिस्क खिसक गई थी, जिससे नसों पर दबाव पड़ रहा था। इसके कारण उनके बाएं हाथ में तेज दर्द और सुन्नपन की समस्या हो रही थी। शुरुआती उपचार और निगरानी के बाद डॉक्टरों ने उनकी एंटेरियर सर्वाइकल डिस्केक्टॉमी एंड फ्यूजन (ACDF) सर्जरी की। इस प्रक्रिया में गर्दन के सामने की ओर से चीरा लगाकर प्रभावित डिस्क को हटाया गया, ताकि नसों पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सके। रीढ़ को स्थिरता देने के लिए केज, प्लेट, स्क्रू और बोन ग्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया।

अस्पताल के अनुसार, सर्जरी के बाद जतिन को हाथ के दर्द में तुरंत राहत मिली और सुन्नपन की समस्या में भी सुधार हुआ। उन्होंने खड़े होना शुरू किया और अगले दिन से चलने लगे।

छोटे चीरे से एंडोस्कोपिक सर्जरी कर मरीज को मिली राहत

चौथा मामला आगरा के 30 वर्षीय गौतम का था। उन्हें पीठ के निचले हिस्से में गंभीर दर्द रहता था, जो बाएं पैर तक फैलता था। इसके साथ सुन्नपन और झनझनाहट की समस्या भी थी। इन लक्षणों के कारण वह पांच मिनट से अधिक चलने में सक्षम नहीं थे। डॉक्टरों ने छोटे चीरे के माध्यम से एंडोस्कोपिक डिस्केक्टॉमी की। इस तकनीक में हाई-डेफिनिशन एंडोस्कोप की सहायता से नस पर दबाव डालने वाले डिस्क के हिस्से को हटाया जाता है, जिससे आसपास के ऊतकों को कम से कम नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। अस्पताल के मुताबिक, प्रक्रिया के बाद गौतम की स्थिति में सुधार हुआ और अस्पताल से छुट्टी मिलने से पहले उन्होंने चलना शुरू कर दिया।

आधुनिक तकनीकों से मरीजों की जरूरत के अनुसार उपचार संभव: डॉ. हिमांशु त्यागी

फोर्टिस हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के निदेशक डॉ. हिमांशु त्यागी ने कहा कि स्पाइन की समस्याएं व्यक्ति की गतिशीलता, स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर असर डाल सकती हैं। युवाओं में स्कॉलियॉसिस से लेकर वयस्कों में नसों पर दबाव के कारण होने वाले दर्द तक, हर मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार तय करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि सर्जरी और कम से कम नुकसान पहुंचाने वाली आधुनिक तकनीकों में हुई प्रगति से मरीजों की व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप उपचार करने में मदद मिली है। बेहतर रिकवरी के लिए सर्जरी के साथ नियमित फॉलो-अप और विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में पुनर्वास भी महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, वर्ल्ड स्पाइन डे लोगों को रीढ़ की सेहत, समय पर जांच और विशेषज्ञ देखभाल के प्रति जागरूक करने का अवसर है।

विशेषज्ञों की संयुक्त देखभाल पर अस्पताल का जोर

फोर्टिस हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा की फैसिलिटी निदेशक बिंदु शर्मा ने कहा कि चारों मरीजों की स्थिति में सुधार अस्पताल की सर्जिकल, नर्सिंग और देखभाल टीमों के सामूहिक प्रयासों को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि मरीजों की जरूरतों के अनुसार इमरजेंसी मेडिसिन, गहन देखभाल, कार्डियोलॉजी, पल्मोनोलॉजी, पीडियाट्रिक्स और इंटरनल मेडिसिन के विशेषज्ञ भी सहयोग करते हैं।।उन्होंने कहा कि शुरुआती जांच और सर्जरी की तैयारी से लेकर ऑपरेशन के बाद की देखभाल तक समन्वित उपचार मरीजों की देखभाल में निरंतरता बनाए रखने में मदद करता है। अस्पताल ने स्पाइन से जुड़ी समस्याओं के उपचार और रिकवरी के दौरान मरीजों व उनके परिवारों को सहायता उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता दोहराई।

विशेषज्ञों के अनुसार, रीढ़ से जुड़ा लगातार दर्द, हाथ-पैरों में सुन्नपन, झनझनाहट या चलने में परेशानी होने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। उपचार का विकल्प मरीज की जांच, बीमारी की गंभीरता और विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर तय किया जाना चाहिए।