श्री धार्मिक रामलीला में प्रभु श्रीराम की मर्यादा, भरत के त्याग और जटायु की निष्ठा का संदेश; 18 अक्टूबर को शबरी-राम मिलन, हनुमान मिलन और बाली वध सहित कई प्रसंगों का होगा मंचन

ग्रेटर नोएडा, रफ़्तार टूडे। श्री धार्मिक रामलीला मंचन एवं दशहरा महोत्सव 2026 के सातवें दिन 17 अक्टूबर को चित्रकूट लीला, श्रीराम-भरत मिलाप, पंचवटी प्रसंग, सीता हरण और जटायु वध का भावपूर्ण मंचन किया गया। प्रभु श्रीराम के वनवास, भ्राता भरत के त्याग, सूर्पणखा प्रसंग और माता सीता के हरण की कथा ने दर्शकों को रामायण के आदर्शों से जोड़ दिया। जटायु के बलिदान और भगवान श्रीराम द्वारा उन्हें सम्मान देने के प्रसंग ने विशेष रूप से दर्शकों को भावुक किया। रामलीला परिसर में प्रभु श्रीराम और माता सीता के जयकारे गूंजते रहे।

परम पूज्य गोस्वामी सुशील जी महाराज के दिशा-निर्देशन तथा युवा अध्यक्ष आनंद भाटी के मार्गदर्शन में आयोजित यह रामलीला 11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन शाम सात बजे से मंचित की जा रही है। महोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में जगद्गुरु स्वामी सतीशाचार्य जी महाराज, प्रेमेश्वर पीठ, महर्षि आश्रम का नाम घोषित किया गया है।

चित्रकूट में राम-भरत मिलाप, भरत ने खड़ाऊ लेकर संभाला राजकाज

संस्था के अध्यक्ष आनंद भाटी ने बताया कि सातवें दिन की लीला में दिखाया गया कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में कुटिया बनाकर रहने लगते हैं। दूसरी ओर, अयोध्या में महाराज दशरथ के निधन के बाद भरत वापस लौटते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि प्रभु श्रीराम वनवास में हैं, तो वे उन्हें वापस अयोध्या लाने के लिए पूरी अयोध्या के साथ चित्रकूट पहुंचते हैं। भरत भगवान श्रीराम से अयोध्या लौटकर राजगद्दी संभालने का आग्रह करते हैं, लेकिन श्रीराम पिता के वचन और आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए वनवास पूरा करने का संकल्प नहीं छोड़ते। अंततः भरत श्रीराम की खड़ाऊ लेकर अयोध्या लौटते हैं और उन्हीं को सर्वोच्च मानकर राजकाज चलाने का निर्णय लेते हैं। यह प्रसंग त्याग, भ्रातृप्रेम, कर्तव्य और मर्यादा का अनुपम संदेश देता है।

पंचवटी में सूर्पणखा प्रसंग, खर-दूषण का वध

चित्रकूट में बार-बार अयोध्यावासियों के आने की संभावना को देखते हुए भगवान श्रीराम पंचवटी में नई कुटिया बनाकर रहने लगते हैं। वनवास के दौरान वे ऋषि-मुनियों को राक्षसों के भय से मुक्त कराते हैं। इसी बीच रावण की बहन सूर्पणखा की नजर श्रीराम पर पड़ती है और वह उनसे विवाह करने की इच्छा व्यक्त करती है। श्रीराम के विवाहित होने की बात कहने पर सूर्पणखा लक्ष्मण के पास जाती है। विवाद बढ़ने और माता सीता पर आक्रमण की कोशिश के बाद लक्ष्मण उसकी नाक-कान काटकर उसे दंडित करते हैं। अपमानित सूर्पणखा अपने भाइयों खर और दूषण के पास पहुंचती है। दोनों भारी सेना के साथ श्रीराम से युद्ध करने आते हैं, लेकिन भगवान श्रीराम उनका वध कर देते हैं।

स्वर्ण मृग के छल में फंसीं माता सीता, रावण ने किया हरण

खर-दूषण के वध और सूर्पणखा के अपमान की जानकारी मिलने पर रावण बदला लेने की योजना बनाता है। वह अपने मामा मारीच के साथ पंचवटी पहुंचता है। मारीच स्वर्ण मृग का रूप धारण करता है, जिसकी सुंदरता देखकर माता सीता उसे पाने की इच्छा व्यक्त करती हैं। श्रीराम पहले उन्हें समझाते हैं, लेकिन आग्रह करने पर स्वर्ण मृग के पीछे चले जाते हैं। दूर जाकर बाण चलाने पर मारीच मरते समय श्रीराम की आवाज में ‘हा लक्ष्मण, हा लक्ष्मण’ पुकारता है। आवाज सुनकर माता सीता लक्ष्मण को श्रीराम की सहायता के लिए भेज देती हैं। इसी अवसर का लाभ उठाकर रावण साधु का वेश धारण कर आता है और माता सीता का हरण कर ले जाता है।

जटायु ने माता सीता की रक्षा के लिए रावण से लिया मोर्चा

रावण जब माता सीता को लेकर जा रहा होता है, तब गिद्धराज जटायु उन्हें बचाने के लिए रावण से युद्ध करते हैं। दोनों के बीच भयंकर संघर्ष होता है, लेकिन रावण जटायु को गंभीर रूप से घायल कर देता है और सीता को लेकर आगे बढ़ जाता है। माता सीता की खोज करते हुए भगवान श्रीराम को घायल जटायु मिलते हैं। जटायु उन्हें सीता हरण की पूरी घटना बताते हैं और इसके बाद अपने प्राण त्याग देते हैं। भगवान श्रीराम जटायु का अंतिम संस्कार कर उन्हें पिता के समान सम्मान प्रदान करते हैं।

इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि प्रभु श्रीराम ने मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति और सभी जीव-जंतुओं के प्रति भी प्रेम, करुणा और सम्मान का भाव रखा। रामलीला में इन दृश्यों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया और पूरा परिसर जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा।

18 अक्टूबर को शबरी प्रसंग और राम-हनुमान मिलन का मंचन

संस्था की ओर से आगामी कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया गया कि 18 अक्टूबर को शबरी प्रसंग, राम-हनुमान मिलन, किष्किंधा लीला और बाली वध का मंचन किया जाएगा। इसके बाद अशोक वाटिका, लंका दहन, सेतु निर्माण और रावण-अंगद संवाद जैसे महत्वपूर्ण प्रसंग भी दर्शकों के सामने प्रस्तुत किए जाएंगे। 19 अक्टूबर को लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध तथा श्रीराम और रावण के बीच निर्णायक युद्ध सहित प्रमुख प्रसंगों का मंचन प्रस्तावित है। आयोजकों का कहना है कि इस वर्ष का दशहरा महोत्सव और रामलीला मंचन क्षेत्रवासियों के लिए यादगार आयोजन बनने जा रहा है। इसका उद्देश्य धार्मिक आस्था के साथ-साथ नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों, त्याग, सेवा और मर्यादा की परंपरा से जोड़ना है।

आयोजन में संस्था के पदाधिकारी और सदस्य रहे उपस्थित

इस अवसर पर संस्था के संस्थापक गोस्वामी सुशील जी महाराज, संस्थापक राजकुमार नागर, प्रदीप शर्मा, शेर सिंह भाटी, हरवीर मावी, मुख्य संरक्षक नरेश गुप्ता, संरक्षक सुशील नागर, धीरेंद्र भाटी, धीरज शर्मा, बालकिशन सफीपुर, दिनेश गुप्ता, पवन नागर, मनोज गुप्ता, अध्यक्ष आनंद भाटी, महासचिव ममता तिवारी, कोषाध्यक्ष अजय नागर, वरिष्ठ उपाध्यक्ष महेश शर्मा बदौली, उमेश गौतम, सत्यवीर मुखिया, रोशनी सिंह, महेश कमांडो, चैन पाल प्रधान, जितेंद्र भाटी, सुभाष भाटी, मनीष डाबर, मीडिया प्रभारी अतुल आनंद, उपाध्यक्ष फिरे प्रधान, पीपी शर्मा, श्याम सुंदर फौजी, यशपाल नागर, सचिव ज्योति सिंह, गीता शागर, राकेश भाटी, भगवत भाटी, तेज कुमार भाटी, सुंदर भाटी, पवन भाटी, वीरपाल मावी और जय शर्मा सहित अन्य पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।